हालांकि, मंदिरों में आने वाले अधिकांश लोग इस पर ध्यान तो देते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि शिवलिंग के सामने नंदी की मूर्ति स्थापित करने के पीछे गहरा पौराणिक और आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है।
नंदी कैसे बने भगवान शिव की सवारी?
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में शिलाद नाम के एक ऋषि थे जो भगवान शिव के परम भक्त थे। वे निरंतर महादेव की भक्ति में लीन रहते थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी।
एक बार उनके पितरों ने उन्हें बताया कि उनका वंश समाप्त होने की स्थिति में है। ऐसे में उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए भगवान शिव की कठोर तपस्या की। ऋषि शिलाद की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया।
कुछ समय बाद जब ऋषि शिलाद भूमि को जोत रहे थे, तब उन्हें भूमि से एक बालक मिला। उन्होंने उस बालक का नाम नंदी रखा और उसे अपने पुत्र के रूप में पालने लगे।
नंदी की आयु को लेकर हुई भविष्यवाणी
एक दिन ऋषि शिलाद के आश्रम में दो संत आए। उन्होंने नंदी को देखकर भविष्यवाणी की कि इस बालक की आयु बहुत कम है और वह केवल आठ वर्ष तक ही जीवित रहेगा।
यह बात सुनकर ऋषि शिलाद बेहद चिंतित हो गए। जब नंदी को इस बात का पता चला, तो उन्होंने अपने पिता को सांत्वना देते हुए कहा कि उन्हें भगवान शिव की कृपा से ही प्राप्त किया गया है, इसलिए उन्हें महादेव पर पूरा विश्वास है।
भगवान शिव ने दिया अमरत्व का वरदान
इसके बाद नंदी ने भगवान शिव की कठोर तपस्या शुरू कर दी। उनकी अटूट भक्ति और समर्पण को देखकर भगवान शिव प्रसन्न हुए और उनके सामने प्रकट हुए।
भगवान शिव ने नंदी से कहा कि तुम मेरे ही अंश हो, इसलिए तुम्हें मृत्यु का भय नहीं होना चाहिए। इसके बाद उन्होंने नंदी को अजर-अमर होने का वरदान दिया।
तभी से नंदी भगवान शिव के अभिन्न अंग बन गए और उनकी सवारी के रूप में प्रतिष्ठित हुए। यही कारण है कि हर शिव मंदिर में शिवलिंग के सामने नंदी की मूर्ति स्थापित की जाती है।
नंदी पूजा का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नंदी की पूजा के बिना भगवान शिव की पूजा अधूरी मानी जाती है। इसलिए शिव पूजा के दौरान नंदी का पूजन भी किया जाता है।
मान्यता है कि नंदी की सच्चे मन से पूजा करने से साधक की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सुख-शांति और शुभ फल की प्राप्ति होती है।
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