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Mahabharat Katha: जानते हुए भी कि दुर्योधन अधर्मी है, कर्ण ने कभी उसका हाथ नहीं छोड़ा? यहां पढ़िए कारण

Mahabharat Katha: जानते हुए भी कि दुर्योधन अधर्मी है, कर्ण ने कभी उसका हाथ नहीं छोड़ा? यहां पढ़िए कारण

धर्म डेस्क। महाभारत की कथा जब भी मित्रता के सन्दर्भ में सुनी जाती है, तो कृष्ण-सुदामा के साथ-साथ कर्ण-दुर्योधन का नाम भी सम्मान से लिया जाता है। कर्ण और दुर्योधन की मित्रता इस बात का जीवंत प्रमाण है कि एक सच्चा मित्र केवल सुख में ही नहीं, बल्कि विनाश के द्वार पर भी साथ खड़ा रहता है। कर्ण भली-भांति जानते थे कि दुर्योधन अधर्म के पथ पर है, फिर भी उन्होंने अंत तक अपनी वफादारी नहीं छोड़ी।

रंगभूमि का वह अपमान और दुर्योधन का उपकार

महाभारत के प्रसंग के अनुसार, रंगभूमि में शस्त्र-प्रदर्शन के दौरान जब कर्ण ने अर्जुन को चुनौती दी, तब कृपाचार्य ने कर्ण के कुल (सूत-पुत्र) को लेकर उन्हें अपमानित किया। नियम के अनुसार, बिना राजा हुए कोई राजकुमार से द्वंद्व नहीं कर सकता था।

उस समय जब पूरी सभा मौन थी, तब दुर्योधन ने आगे बढ़कर कर्ण की योग्यता का सम्मान किया और उन्हें अंग देश का राजा घोषित कर दिया। उस दिन दुर्योधन ने न केवल कर्ण को एक राज्य दिया, बल्कि वह सम्मान भी दिया जिसे समाज उनके कुल के आधार पर नकार रहा था। इसी उपकार और सम्मान के बदले कर्ण ने अपना संपूर्ण जीवन दुर्योधन को समर्पित कर दिया।

जब कृष्ण ने खोला जन्म का रहस्य

कथा के अनुसार, युद्ध से ठीक पहले भगवान श्रीकृष्ण ने कर्ण को एकांत में बुलाया और उनके जन्म का रहस्य उजागर किया। कृष्ण ने बताया कि कर्ण वास्तव में कुंती के पुत्र और पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता हैं।

श्रीकृष्ण ने कर्ण के सामने एक लुभावना प्रस्ताव रखा

  • चक्रवर्ती सम्राट: यदि कर्ण पांडवों की ओर आते हैं, तो वे ज्येष्ठ होने के नाते हस्तिनापुर के सम्राट बनेंगे।
  • पांडवों की सेवा: स्वयं अर्जुन, भीम और अन्य भाई उनकी सेवा करेंगे।

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मित्रता की खातिर ठुकरा दिया राजपाट

कर्ण ने भगवान कृष्ण की बात सुनकर विनम्रता से कहा कि भले ही पांडव उनके सगे भाई हैं, लेकिन जिस समय पूरी दुनिया उन्हें ‘सूत-पुत्र’ कहकर तिरस्कृत कर रही थी, उस समय केवल दुर्योधन ने ही उन पर विश्वास जताया। कर्ण ने कहा, “हे केशव! यदि आज मैं सत्ता के लालच में दुर्योधन को छोड़ देता हूँ, तो इतिहास मुझे एक कृतघ्न मित्र के रूप में याद रखेगा।”

कर्ण की इस निष्ठा को देखकर स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण भी अभिभूत हो गए। उन्होंने कर्ण के समर्पण की सराहना करते हुए कहा कि ऐसा मित्र पाना सौभाग्य की बात है और युगों-युगों तक इस मित्रता की मिसाल दी जाएगी।

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