धर्म डेस्क। महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव और माता शक्ति के मिलन का महापर्व है। लेकिन पौराणिक शास्त्रों के अनुसार, इस दिव्य विवाह से पहले एक ऐसा रोचक प्रसंग आता है जब स्वयं भोलेनाथ ने माता पार्वती के प्रेम की परीक्षा लेने के लिए अपना रूप बदल लिया था।
शिव पुराण के रुद्र संहिता के अनुसार, महादेव ने पार्वती जी के अडिग विश्वास को परखने के लिए न केवल वेश बदला, बल्कि अपनी ही कटु निंदा भी की थी।
हजारों वर्षों की तपस्या और महादेव का संशय
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए अन्न-जल त्यागकर हजारों वर्षों तक कठिन तपस्या की थी। उनकी तपस्या की ज्वाला से जब तीनों लोक प्रभावित होने लगे, तब महादेव ने उनकी भक्ति की गहराई मापने का निर्णय लिया। शिव जी यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि पार्वती उनके ‘अघोर’ और ‘फकीर’ स्वरूप को पूरी तरह स्वीकार करने को तैयार हैं या नहीं।
ब्राह्मण का वेश और शिव की बुराई
कथा के अनुसार, जब पार्वती अपनी तपस्या के अंतिम चरण में थीं, तब महादेव एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण कर उनके समक्ष प्रकट हुए। ब्राह्मण ने माता पार्वती से उनकी तपस्या का उद्देश्य पूछा। जब देवी ने शिव से विवाह की इच्छा जताई, तो ब्राह्मण ने उपहास करते हुए शिव की बुराई शुरू कर दी।
‘तुम उस श्मशान निवासी से विवाह करना चाहती हो जिसके गले में सर्प और तन पर भस्म है? वह तो अमंगल का रूप है। उससे विवाह कर तुम केवल दुखों को प्राप्त करोगी।’ – वेशधारी शिव (ब्राह्मण)
ब्राह्मण ने उन्हें किसी वैभवशाली देवता या राजकुमार से विवाह करने की सलाह दी, ताकि वे सुखी जीवन जी सकें।
क्रोधित हुईं पार्वती, महादेव ने मांगा क्षमादान
अपने आराध्य के प्रति ऐसे शब्द सुनकर माता पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गईं। उन्होंने तर्क दिया कि संसार शिव के बाहरी रूप को देखता है, लेकिन वे उनकी दिव्यता और सत्य को जानती हैं। पार्वती जी ने स्पष्ट कह दिया कि यदि महादेव उन्हें नहीं मिले, तो वे अपना जीवन समाप्त कर देंगी लेकिन किसी अन्य का विचार मन में नहीं लाएंगी।
जैसे ही पार्वती जी ने ब्राह्मण को वहाँ से जाने का आदेश दिया, भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गए। वे पार्वती के इस अनन्य प्रेम और अडिग विश्वास को देखकर द्रवित हो उठे और उन्होंने उसी क्षण उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लिया।
महाशिवरात्रि का संदेश
धार्मिक विद्वानों का मानना है कि यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और प्रेम बाहरी चमक-धमक से ऊपर होता है। महाशिवरात्रि इसी अटूट विश्वास की विजय का उत्सव है, जिसे हर साल श्रद्धालु बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं।







