मुरली मनोहर मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना होती है। यहां राधा-कृष्ण के साथ कुब्जा की मूर्ति विराजित है। मंदिर की यह परंपर…और पढ़ें
Publish Date: Thu, 03 Sep 2026 03:02:31 PM (IST)Updated Date: Thu, 03 Sep 2026 03:11:04 PM (IST)
HighLights
- कुब्जा को त्रिवक्रा कहा जाता है, श्रीकृष्ण की मथुरा लीला से जुड़ी हैं।
- शरीर तीन स्थानों से टेढ़ा होने के कारण उन्हें कुब्जा कहा जाता था।
- कुब्जा ने श्रद्धा और समर्पण के साथ श्रीकृष्ण को चंदन अर्पित किया।
विवेक पाराशर, खरगोन। जन्माष्टमी की आहट के साथ खरगोन के प्राचीन मंदिरों में भक्ति का रंग गहराने लगा है। कहीं बाल गोपाल के श्रंगार की तैयारी है तो कहीं जन्मोत्सव की परंपराओं को सजाया जा रहा है।
इसी बीच मुरली मनोहर मंदिर एक अनूठी परंपरा के कारण विशेष पहचान रखता है। यहां श्रीकृष्ण और राधाजी के साथ ‘कुब्जा’ भी विराजित हैं। उनका स्मरण व पूजन किया जाता है।
पुजारी कृष्णकांत शुक्ल के अनुसार मंदिर का निर्माण वर्ष 1760 से 1790 के बीच वृंदावन से आए ब्रह्मचारी हृदयराम ने साद परिवार के सहयोग से कराया था। वर्ष 1914 से मंदिर की व्यवस्था परिवार के पास है।
250 वर्ष से अधिक पुरानी परंपरा में छिपा है भक्ति का संदेश
मुरली मनोहर मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना होती है। यहां राधा-कृष्ण के साथ कुब्जा की मूर्ति विराजित है। मंदिर की यह परंपरा करीब 250 वर्ष से अधिक पुरानी बताई जाती है और इसके पीछे भक्ति का विशेष संदेश छिपा है।
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भक्ति ने बदली कुब्जा की कथा
- कुब्जा, जिन्हें ‘त्रिवक्रा’ भी कहा जाता है, श्रीकृष्ण की मथुरा लीला से जुड़ी हैं। वे कंस के महल में चंदन का लेप तैयार करती थीं। शरीर तीन स्थानों से टेढ़ा होने के कारण उन्हें कुब्जा कहा जाता था।
- धार्मिक कथा के अनुसार, जब कंस के बुलावे पर श्रीकृष्ण और बलराम मथुरा पहुंचे, तब मार्ग में उनकी भेंट कुब्जा से हुई। वह चंदन लेकर जा रही थीं।
- कुब्जा ने श्रद्धा और समर्पण के साथ श्रीकृष्ण को चंदन अर्पित किया। उनकी निष्कपट भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें आशीर्वाद दिया और उनका टेढ़ा शरीर सीधा हो गया।
- यह प्रसंग केवल रूप परिवर्तन की कथा नहीं है। इसमें यह भाव भी निहित है कि प्रभु के लिए बाहरी रूप, सामर्थ्य या सामाजिक स्थिति से अधिक महत्वपूर्ण भक्त का मन और उसकी सच्ची भावना होती है।
विशेष जयंती का योग
इस बार जन्माष्टमी पर अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र व वृषभ राशि में होने का विशेष संयोग बन रहा है। श्रीकृष्ण जन्म से इन स्थितियों का विशेष संबंध माना जाता है।
25 साल में छठवीं बार ऐसा संयोग
इस बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का दुर्लभ संयोग स्मार्त और वैष्णव, दोनों परंपराओं को एक ही दिन उत्सव मनाने का अवसर दे रहा है। पिछले 25 वर्षों में ऐसे अवसर पांच बार आए हैं, जब दोनों परंपराओं में जन्माष्टमी एक ही दिन मनाई गई।








