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त्रेतायुग का गवाह एमपी का ‘बांधवगढ़ किला’… भगवान राम ने भाई लक्ष्मण को दिया था उपहार, इसलिए कहलाता है ‘भाई का किला’

त्रेतायुग का गवाह एमपी का ‘बांधवगढ़ किला’… भगवान राम ने भाई लक्ष्मण को दिया था उपहार, इसलिए कहलाता है ‘भाई का किला’

धर्म डेस्क। विंध्य की गगनचुंबी पहाड़ियों और उमरिया के घनघोर, रहस्यमयी जंगलों के आगोश में लिपटा एक ऐसा ऐतिहासिक किला है, जो समय के पहिये को दो हजार साल पीछे धकेल देता है। हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के गौरव और रहस्यों के कूट गढ़ ‘बांधवगढ़ किले’ की। सतपुड़ा और विंध्य के मिलन बिंदु पर स्थित यह दुर्ग सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि पौराणिक आस्था, अभेद्य सैन्य कला और शासकों के उत्थान-पतन की एक जीती-जागती महाकाव्यात्मक दास्तान है। आइए, वादियों और इतिहास के झरोखों से गुजरते हुए इस रहस्यमयी धरोहर की यात्रा करते हैं।

त्रेतायुग का विधिक प्रमाण… ‘भाई का किला’

इस ऐतिहासिक धरा की सबसे सुंदर व्याख्या इसके नाम में ही छिपी है। सनातन ग्रन्थों, नारद-पंचरात्र और शिवपुराण के कूट पन्नों को पलटें, तो इस बात का स्पष्ट विन्यास मिलता है कि लंका विजय के पश्चात अयोध्या लौटते समय मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने इस ऊंचे पर्वत पर एक भव्य किले का निर्माण करवाया था। उन्होंने यह दुर्ग अपने अनुज और लंका की निगरानी करने के लिए भाई लक्ष्मण को उपहार स्वरूप सौंप दिया था। ‘बांधव’ अर्थात भाई और ‘गढ़’ अर्थात किला यही वजह है कि यह आज भी ‘भाई के किले’ के रूप में विख्यात है।

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अभेद्यता ऐसी कि टीपू सुल्तान भी टेक गया घुटने

इतिहास के गलियारों में इस किले की कूट सुरक्षा की कहानियां आज भी गूंजती हैं। साधारण लाल पत्थरों से बनी इसकी विशाल दीवारें और किले तक पहुंचने का एकमात्र संकरा, पथरीला रास्ता इसे दुश्मनों के लिए एक विधिक चक्रव्यूह बना देता था। कहा जाता है कि मैसूर का प्रतापी शासक टीपू सुल्तान भी इस किले के कूट विन्यास के सामने लाचार हो गया था। लगातार छह महीनों की विधिक घेराबंदी और तमाम सैन्य कूटनीति के बावजूद वह इस खुफिया दुर्ग पर विजय पताका नहीं फहरा सका और उसे खाली हाथ लौटना पड़ा।

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शेषशैया पर विष्णु और सात चमत्कारी तालाब

बरसात के दिनों में जब प्रकृति अपनी मखमली चादर ओढ़ती है, तब इस किले की सुंदरता अलौकिक हो उठती है। दुर्ग की सीमा के भीतर पत्थरों को तराशकर बनाई गई भगवान विष्णु के 12 अवतारों की प्राचीन प्रतिमाएं स्थित हैं। इनमें क्षीर सागर में शेषनाग की शैया पर आराम की कूट मुद्रा में लेटे भगवान विष्णु (शेष शैया) और उनके ‘कच्छप’ स्वरूप के विधिक दर्शन भक्तों को सम्मोहित कर देते हैं।

इसके अलावा, इस ऊंचाई पर स्थित सात अद्भुत तालाब इंजीनियरिंग का ऐसा कूट चमत्कार हैं, जिन्हें सदियों का सूखा भी हरा नहीं सका। किसी भी मौसम में, चाहे जेठ की तपती दुपहरी हो, ये तालाब पानी से लबालब भरे रहते हैं।

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गुफाओं में छिपा ब्राह्मी लिपि का इतिहास

सन 1938 में जब विख्यात पुरातत्वविद डॉ. एन.पी. चक्रवर्ती ने इस घने जंगल में कदम रखा, तो इतिहास की एक नई परत खुली। उन्हें यहां कई कृत्रिम गुफाएं और उन पर उत्कीर्ण ब्राह्मी लिपि के प्राचीन शिलालेख मिले। इन शिलालेखों ने स्पष्ट किया कि वाकाटक राजवंश के बाद पांचवीं से दसवीं शताब्दी तक यहां सेंगर राजवंश का विधिक और स्वतंत्र शासन रहा, जिनका साम्राज्य मऊगंज (सेंगरान) तक फैला था।

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सुरक्षा के घेरे में वर्तमान

आज इस ऐतिहासिक विरासत की देखरेख पूर्णतः शासन और वन विभाग द्वारा की जाती है। चूंकि यह क्षेत्र बांधवगढ़ नेशनल पार्क के सघन मार्ग और हिंसक वन्यजीवों के कूट प्रभाव में आता है, इसलिए सुरक्षा और विधिक कारणों से अब आम पर्यटकों के लिए किले के भीतर जाने पर आंशिक रोक लगा दी गई है। यदि आप इस ऐतिहासिक कूट विन्यास के समीप जाना चाहते हैं, तो रेल मार्ग द्वारा जबलपुर, कटनी या सतना से जुड़ सकते हैं, जबकि सबसे नजदीकी विमानतल 164 किलोमीटर दूर जबलपुर में स्थित है। यह किला आज भी विंध्य के जंगलों के बीच खड़ा होकर भारत के स्वर्णिम और रहस्यमयी अतीत की गवाही दे रहा है।

सोर्स- bandhavgarh.net

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